
सिरोही(हरीश दवे)।

भागवत के तीसरे दिन प्रातः 9.00 बजे भक्तगणों द्वारा सर्वकल्याण हेतु विष्णु सहस्रनाम एवं महालक्ष्मी यज्ञ किया गया । जिसमे नरेंद्रपाल सिंह, महेंद्रपाल सिंह, विजयपाल सिंह, सुनील गुप्ता एवं सुनंदा जैन अन्य भक्तगणों ने आहुतियां दी ।
दोपहर कथा में 1.00 बजे कथा वाचक भाई संतोष सागर भागवत रस धारा पान करते हुए बताया की कलयुग में श्रवण करना ही परम मोक्षदायिनी है ।
राजा परीक्षित गोदावरी के किनारे भोजन, फल त्याग कर सुखदेव जी महाराज से कथा श्रवण कर रहे है ।
मन हमेशा चंचल होता हैं मन जितना स्वतंत्र एवं खुला छोड़ दो उतना ही पतन की ओर गिरता है मन को अच्छे कार्यों को करने में त्याग और प्रयास करना पड़ता है
हमारे मोह बंधन के कारण ही हम संसार बंधन से बंधे है । देवहुति माता को पुत्र ऋषि कपिल ने मुक्ति का मार्ग बताया ।
आगे सुखदेव ज़ी राजा परीक्षित को बताते है की राजा दक्ष की पुत्री सती एवं भगवान महादेव की कथा का वृतांत में बताया की जीवन में संशय से ही विनाश होता है । माता सती के शंशय एवं शंका स्वभाव के कारण महादेव ने परित्याग किया, माता सती ने संशय में भगवान राम की परीक्षा ली, इधर राजा दक्ष ने महायज्ञ का कार्यक्रम रखा माता सती बिना निमंत्रण के राजा दक्ष यज्ञ में चली गयी, तिरस्कार सह न सकी और उसी यज्ञ कुंड में स्वयं को स्वाहा कर दिया । त्रिशूल से माता सती के 51 खंड हो गये जिन्हे 51 शक्ति पीठ के नाम से जानते हैँ ।
कथा में आगे सुखदेव जी ने उत्तानपद एवं पत्नी सुनीति पुत्र ध्रुव एवं सुरुचि की व्याख्या करते हुए
श्रीहरी का नाम ही मुक्ति का मार्ग बताया। हरी का अर्थ ही सारे दुखः एवं पापों को हरने वाला है । ध्रुव जी माता सुरूची द्वारा तिरस्कार के पश्चात विरक्ति में केवल हरिनारायण की प्राप्ति के लिए नारद जी के बताए अनुसार मथुरा के पास नारद कुंड के निकट ध्रुव टीले पर पांच महीने अन्न, जल, वायु एवं अन्त में श्वास भी त्याग कर द्वादश मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का स्मरण करते हुए परमात्मा के दर्शन किए ।
संत संतोष सागर ने बताया की संसार के मोह की मुक्ति का एक ही उपाय है की “मोह” त्याग कर भाव एवं प्रेम से “मोहन” में मन को लगाए ही हरी मिलन का मार्ग है ।
भगवान ऋषभदेव, जयंती नंदन भरत, चैतन्य महाप्रभु, रत्नमाल की कथा की व्याख्या करते हुए सुखदेव जी ने राजा परीक्षित को मनुष्य के कर्म बंधनों के बारे में बताया एवं कर्मो के आधार पर स्वर्ग और 28 प्रकार के नरको की व्याख्या की । पाप से बचने के दो उपाय बताए पहला पश्चाताप एवं दूसरा प्रायश्चित । पश्चाताप के बाद प्रायश्चित करने के लिए एक श्रेष्ठ सदगुरु के मार्गदर्शन से ही मुक्ति संभव है । कथा में संत पागल बाबा संत रामाज्ञा दास जी का भी सानिध्य रहा ।
कथा में डॉक्टर जगदीश शर्मा, डॉक्टर सुनंदा जैन, गायत्री शर्मा पंडित भगवती लाल ओझा, महेश त्रिवेदी, सुनील कुमार गुप्ता, शैतान सिंह, महेंद्र पाल सिंह, नरेंद्र पाल सिंह, विजयपाल सिंह, करण सिंह डाबी, मदन सिंह सिंदल, मदन सिंह परमार, ओंकार सिंह, उदावत, राजेंद्र सिंह राठौड़ रामचंद्र प्रजापत, बाबूलाल सहित कई भक्तगणों का सहयोग रहा ।



संपादक भावेश आर्य



