महाराव विजयराज देवडा की खिलजी पर जीत पर देवासी समाज ने भरी सरणुआ नाथ की हुंकार -राज महल से निकली शाही पालकी व

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देव झुलनी एकादशी पर निकली रेवाडी,
देवासी समाज ने हजारो की तादाद में झूमते गाते भरी हुंकार,


नगर के मन्दिरो की पालकियां पदम् जी मन्दिर में पूजा अर्चना के बाद अखेलाव तालाब पे गाजे बाजे पहुची।


सिरोही के पूर्व नरेश ने वाहन से शिरकत की।


युवराज इंद्रेश्वर सिंह देवड़ा व राज परिवार के साथ नगर वासी हजारो की तादाद में पालकीयो में प्रभु दर्शन को पहुचे।


सिरोही, 22 सितंबर (हरीश दवे)।

सिरोही शहर के आराध्य देव सारणेश्वर महादेव मंदिर का वार्षिक मेला हर्ष वर्ष की भांति इस वर्ष भी दो दिवसीय मेले का आयोजन आरंभ हुआ। इस दौरान प्रथम दिवस पर यानि देवझुलनी एकादशी पर शहर में चली आ रही परंपरा के मध्य शाम को राजमहल स्थित पदमनाथजी मंदिर से शाही अंदाज में राजसी ठाठ बाठ के साथ ठाकुरजी की पालकी व रेवाडी निकाली गई।
अन्य समाज की भी निकली पालकी
इससे पूर्व शहर में दोहपर व शाम को को उत्तरी मेघवाल वास व दक्षिणी मेघवाल वास सहित अन्य समाज की भी पालकी निकाली गई, जो विभिन्न रास्तों से बैंड बाजों व ढोल थाली एवं डीजे की धून पर नाचते गाते युवक, युवतियां, महिलाएं, वृद्ध, बुजुर्ग शामिल थे और नृत्य करते हुए चल रहे थे। इस बीच अन्य समाज के लोगों ने भी ज्योत, धूप अर्पण किए और खुशहाली की कामना की तथा पालकी के नीचे से निकल कर आर्शीवाद प्राप्त किया।
शाही अंदाज में निकली ठाकुरजी की पालकी
इसके उपरांत शाम को राजमहल स्थित पदमनाथजी मंदिर से राजसी अंदाज में युवराज देवत सिंह जी व महाराज देवत सिंह जी अपने सैनिकों व राजसी आयुधो साथ घोडे के साथ ठाकुरजी की पालकी में प्रभु जी की रेवाडी में चल रहे थे जिसमें राजस्थान के हजारों की संख्या में देवासी समाज के लोगों ने अपनी परंपरागत वेशभूषा में हाथ में लाठिया लेकर जय सरणुआनाथ की जय व सारणेश्वर महादेव की जय के साथ हूंकार भरते हुए शहर के विभिन्न मार्गों से होते हुए तालाब किनारे पहुंचे, जहां पूजा अर्चना के बाद ठाकुरजी को स्नान करवाया जाएगा। इसके उपरांत पुनः पालकियां अपने अपने गंतव्य स्थान की और लौट गई।
विजय प्राप्ति पर एक दिवसीय मेला देवासी समाज का

कहते है कि इस मेले की शुरूआत 1298 में की गई और भाद्रपद माह की ग्यारस, यानि विक्रम सवंत 1355 में तत्कालीन शासक महाराव विजय राज देवडा ने सिद्धपुर, गुजरात के रूद्रमल से औदीच्य गोरवाल ब्राम्हणों द्वारा शिवलिंग को वापस लाने के बाद अलाउद्दीन खिलजी की सेना के साथ हुए युद्ध में सिरोहि की प्रजा के साथ देवासी समाज ने अपने आराध्य सारणेश्वर महादेव की रक्षा में अपुर्व शौर्य व पराक्रम से मलिक काफूर व खिलजी की सेना को भगाया था। उस समय देवासी समाज ने महाराव विजयराज देवडा का साथ दिया। इसी कारण से यह मेला देवासी समाज के लिए साहस, शौर्य, बलिदान और विजय के स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
सिरोही राज्य की स्थापना के समय से निकलती है पहली पालकी
बताया जाता है कि 1425 में सिरोही राज्य की स्थापना के समय महल से पहली पालकी रवाना होती है, जिस कारण सम्मान स्वरुप देवासी समाज को एकादशी को सारणेश्वरजी मेले के आयोजन का अधिकार दिया और दूसरे दिन सिरोही शहर की आमजन के लिए दरवाजे खोल दिए गए, जब से यह परंपरा चली आ रही है और देवासी समाज के एक दिवसीेेेय मेले के बाद दूसरे दिन आमजन सारणेश्वर महादेव के दशनार्थ हेतु शहर सहित आसपास के गांवों के हजारों लोक इसमें भाग लेते है।
आज देव झुलनी एकादशी पर पूकिस उपाधीक्षक व सिटी कोतवाली व सदर पुलिस के सीआई व जाब्ता तैनात था।
वही सरनेश्वर जी देवासी समाज के मेले को लेकर भी पुलिस ने चाक चौबंद व्यवस्था की है।

संपादक भावेश आर्य

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