इतिहास, धर्म और संस्कृति का अद्वितीय प्रतीक है सारणेश्वर मेला,

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सिरोही युवराज इंद्रेश्वर सिंह,धुंबड़िया मठ के महन्त पूज्य राज भारतीजी महाराज,राज्य मंत्री ओटाराम देवासी,रानीवाड़ा विधायक रतन देवासी, केंद्रीय घुमंतू बोर्ड सदस्य नारायण देवासी,महन्त राजू गिरी जी,महन्त रामपुरी जी, रूप पूरी जी,महन्त तीरथ गिरी जी,प्रधान राधिका देवासी का रहा सानिध्य व आतिथ्य

सिरोही की प्रजा ने अलाउद्दीन खिलजी को हराया था और पिछले 718 सालों से मनाया जाता है स्थानीय विजय दिवस


सिरोही, 23 सितंबर (हरीश दवे)।

सारणेश्वर मेला सिरोही के इतिहास, धर्म और संस्कृति का अद्वितीय प्रतीक है। यह मेला हर साल सिरोही की जीत और हिन्दू आस्था की रक्षा की याद में मनाया जाता है। खिलजी से युद्ध की जीत देवझूलनी एकादशी के दिन महाराव श्री विजय राजजी और सिरोही की प्रजा ने अलाउद्दीन खिलजी को हराया था, इसलिए यह इतिहासिक विजय दिवस् सिरोही के लिए महत्वपूर्ण बन गया और इस जीत की स्मृति में महाराव श्री विजय राजजी ने उस क्षेत्र के रबारी समाज को एक दिन के लिए सारणेश्वर का अधिकार दिया। इस वचन ने एक परंपरा का रूप ले लिया, जो आज भी हर साल निभाई जाती है। यह परंपरा पिछले 718 सालों से चली आ रही है और इसे स्थानीय विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।
मंगलवार से शुरू हुए सारणेश्वर महादेव का दो दिवसीय मेले के दूसरे दिन बुधवार को सुबह से ही शहर के आस पास के गांवों से हजारों की संख्या में देवासी नर नारी पारंपरिक रेबारी परिधान में युवक पगड़ी में राजस्थान व देवासी समाज की समृद्ध लौकिक संस्कृति को जीवंत कर रहे थे।
श्रद्धालुओं ने सरनेश्वर महादेव के दर्शन किये व मेले में मनोरंजन के झूले व खरीददारी के लिए हाट सा लगा था। इस दौरान मंदिर परिसर में सुबह से ही लोगों की कतारबद्ध भीड देखने को मिली। भयंकर गर्मी में भी लोगों का दिन भर आवागमन चलता रहा। शाम को स्थानीय शहरवासियों ने दर्शन किए। इस दौरान मंदिर परिसर में हर-हर महादेव, जय सारणेश्वर महादेव, सरणुआनाथ की जयकारे, भूरिया बाबा री जय जैसे इत्यादि नारे गूंजायमान होते रहे। वहीं मंदिर परिसर के बाहर झूले, खाने पीने के स्टाॅल, बच्चों के खिलौने इत्यादि पर भी चल पहल बनी रही।
पूर्ण होती है सभी मनोकामनाएं
सारणेश्वरजी महादेव न केवल सिरोही के इतिहास का प्रतीक हैं, बल्कि धार्मिक आस्था के एक केंद्र भी हैं। इस मंदिर में हर साल हजारों श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति और कोढ़ जैसे गंभीर रोगों के इलाज के लिए आते हैं। ऐसा माना जाता है कि श्री सारणेश्वरजी महादेव की कृपा से सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं और रोग भी दूर होते हैं।
तलवारों की ध्वनि से गूंजने वाला स्थान ’’क्षारणेश्वर’’
इस विजय के बाद दीपावली के दिन, महाराव विजय राज ने रूद्रमाल के शिवलिंग को सिरणवा पहाड़ियों के पास विधिपूर्वक स्थापित करवाया। इस घटना के बाद इस स्थान का नाम “क्षारणेश्वर” पड़ा, जिसका अर्थ है तलवारों की ध्वनि से गूंजने वाला स्थान। आज यह स्थान सारणेश्वरजी के नाम से प्रसिद्ध है और हर साल यहां श्रद्धालु आते हैं।
जलस्त्रोत के पानी से स्नान करने पर ठीक हुआ था खिलजी का रोग

यहीं पर अलाउद्दीन खिलजी पर ईश्वरीय प्रकोप हुआ और उसे भयंकर कोढ़ हो गया। उसकी सेना में जो भी उसके पास जाता था, वह भी इस रोग का शिकार हो जाता था। एक दिन खिलजी के शिकारी कुत्ते जो सेना में शामिल थे वो कही से भीग कर आये और सुलतान खिलजी के पास आकर अपना शरीर झटका, जिससे कुत्ते के शरीर का पानी की कुछ बूंद खिलजी के शरीर पर गिरी, वहां खिलजी का कोढ़ ठीक होने लगा। पता किया कि कुत्ते क्षारणेश्वर मंदिर के पास के एक जलस्रोत से नहाकर आए थे। तब खिलजी ने महाराव श्री विजय राजजी से इस जलस्रोत का पानी स्नान के लिए मांगा। महाराव ने मानवता के धर्म का पालन करते हुए खिलजी को पानी उपलब्ध कराया। उस पानी से स्नान करने के बाद खिलजी का रोग पूरी तरह ठीक हो गया।

संपादक भावेश आर्य

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