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राम झरोखा मंदिर भूमि प्रकरण को लेकर खुलासा, ₹50 करोड़ से अधिक के संभावित घोटाले पर उठे बड़े सवाल।भाजपा नेता तेजराज सोलंकी ने की ईडी से जांच की मांग,

सिरोही 31 मार्च(हरीश दवे)।

सिरोही में राम झरोखा मंदिर भूमि प्रकरण अब आस्था, कानून और प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।जिसको लेकर “हिन्दू वेव” के जिला संयोजक हरीश दवे ने आमरण अनशन किया वही पूर्व विधायक संयम लोढा रामझरोखा लाल वेरा के नगर परिषद द्वारा बनवाये अवैध पट्टो को लेकर राज्य सरकार व प्रशशन को घेर रहे है।
वही राज्य सरकार के प्रमुख शाशन सचीव ने उक्त प्रकरणों को लेकर जिला कलेक्टर से कार्रवाई रिपोर्ट मांगी है।
रामझरोखा के बने अवैध पट्टो को लेकर भाजपा के प्रवासी नेता तेजराज सोलंकी ने प्रेस वार्ता आयोजित कर कहा की
उपलब्ध दस्तावेजों, न्यायालयीन आदेशों और सामने आए तथ्यों के आधार पर यह मामला केवल एक मंदिर की जमीन तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि राम झरोखा मंदिर, राजगुरु स्थान, राम लक्ष्मण मंदिर ट्रस्ट सहित कई धार्मिक संपत्तियों से जुड़ा संभावित बड़े भूमि घोटाले का रूप ले चुका है। आरोप है कि इस पूरे प्रकरण का दायरा सिरोही से आगे महामंदिर, ज्ञानसागर, हेतसागर, रोइडा, मनादर, पिंडवाड़ा और आबूरोड तक फैला हुआ है, जिसकी अनुमानित कीमत ₹50 करोड़ से अधिक बताई जा रही है।
सोलंकी ने तथ्यों के साथ बताया कि मामले का सबसे गंभीर पक्ष एक ही संपत्ति पर दो वसीयतों के उपयोग को लेकर सामने आया है। एक ओर 20 मार्च 2001 की वसीयत को अंतिम और वैध माना गया, वहीं दूसरी ओर 8 मार्च 2001 की कथित वसीयत के आधार पर भूमि विक्रय होने के आरोप लगे हैं। इससे यह प्रश्न खड़ा हो गया है कि प्रशासन ने दोनों वसीयतों की सत्यता की जांच के लिए अब तक क्या कदम उठाए और कथित फर्जी वसीयत के आधार पर जमीन बेचने वालों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
प्रकरण में यह भी आरोप है कि जाली हस्ताक्षरों और फर्जी दस्तावेजों के बावजूद अब तक FIR दर्ज नहीं की गई। शिकायतें दिए जाने के बाद भी पुलिस कार्रवाई नहीं होने से लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। इस मामले में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या पुलिस किसी दबाव में काम कर रही है।
भूमि संरक्षण को लेकर प्रशासन की भूमिका भी कटघरे में है। आरोप है कि जब मंदिर भूमि के विक्रय, लीज और हस्तांतरण जैसे गंभीर आरोप सामने आ चुके थे, तब प्रशासन को तत्काल हस्तक्षेप कर विवादित संपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए थी। ऐसे मामलों में रिसीवर नियुक्त कर स्थिति को यथावत रखने की व्यवस्था की जाती है, लेकिन अब तक ऐसा नहीं किया गया। इससे जनता के बीच संदेह और गहरा हुआ है।
इस पूरे प्रकरण में महंत जयरामदास जी महाराज की दूरदर्शिता का भी जिक्र हो रहा है। बताया जा रहा है कि उन्हें पहले से आशंका थी कि भविष्य में मंदिर भूमि को हड़पने या बेचने के प्रयास हो सकते हैं, इसलिए उन्होंने संपत्ति के नियमन की स्पष्ट व्यवस्था बनाई थी। ऐसे में यदि बाद में भूमि का विक्रय या लीज हुई, तो इसे केवल नियमों की अनदेखी नहीं बल्कि महंत की मंशा, धार्मिक व्यवस्था और विधिक ढांचे के उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है।
जिला कलेक्टर के आदेश को लेकर भी विवाद गहराया है। एक ओर पट्टों को निरस्त किया गया, तो दूसरी ओर आदेश में संबंधित भूमि को राजस्व विभाग की जमीन बताया गया। इस विरोधाभास ने मामले को और संदिग्ध बना दिया है। सवाल उठ रहा है कि यदि यह देव संपत्ति थी तो उसे राजस्व भूमि बताने का आधार क्या था, और क्या इससे किसी पक्ष विशेष को लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई।
प्रकरण में धारा 69A के उपयोग पर भी गंभीर आपत्ति जताई गई है। आरोप है कि यह प्रावधान पैतृक संपत्ति के लिए होता है, जबकि मंदिर भूमि पर इसका उपयोग कर पट्टे जारी किए गए। इसी तरह पट्टा संख्या 43 से 50 तक में गंभीर अनियमितताओं, रिकॉर्ड गायब होने और फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल की बात भी सामने आई है। वहीं आदर्श विद्या मंदिर को 99 वर्ष की लीज दिए जाने को भी पूरी तरह अवैध बताया जा रहा है।
जांच समिति के गठन की घोषणा होने के बावजूद ठोस प्रगति नहीं होने से भी लोगों में असंतोष है। आरोप है कि देरी से जांच प्रभावित हो रही है और समयबद्ध रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जा रही। इसी के साथ ज्ञानसागर, हेतसागर, महामंदिर, रोहीडा मंदिर और अन्य कृषि भूमियों के कथित अवैध विक्रय को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
मामले को लेकर अब उच्च स्तरीय जांच, दोनों वसीयतों की फोरेंसिक पड़ताल, फर्जी दस्तावेज तैयार करने वालों पर आपराधिक कार्रवाई, तत्काल FIR, रिसीवर नियुक्ति, अवैध पट्टों और लीज निरस्तीकरण तथा पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग तेज हो गई है। साथ ही यह भी मांग उठी है कि करोड़ों रुपये के संभावित लेनदेन और राजस्व हानि को देखते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) से भी जांच करवाई जाए।
राम झरोखा मंदिर भूमि प्रकरण अब केवल जमीन का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह सिरोही में आस्था, न्याय और प्रशासनिक जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बनता जा रहा है। जनता अब यह जानना चाहती है कि मंदिरों की भूमि आखिर कौन बचाएगा और फर्जीवाड़ा करने वालों पर कार्रवाई कब होगी।

महन्त जयराम दास के शिष्य सूरदास ने भी मन्दिर के इतिहास पर रोशनी डाली व उनकी जान को खतरा बताया।

संपादक भावेश आर्य

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