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दीक्षा यानि परमात्मा के प्रति सम्मोहन: आचार्य भाग्येशसूरी

*कोमल बनी साध्वी कृपांशी रेखाश्रीजी: आचार्य रविरत्नसूरीश्वर

भटना (हरीश दवे)मई 2026।

भटाना नगर में बुधवार को प्रातः वेला में मुमुक्षु कोमल कुमारी परमार ने विशाल जन समुदाय के बीच सूरिमंत्र समाराधक आचार्यदेव श्री रविरत्नसूरीश्वरजी के हाथों से रजोहरण (ओघा) ग्रहण कर संसार का त्याग कर संयम जीवन अपनाया। उनके नूतन नाम की उद्घोषणा उनकी सांसारिक भुआ रसीला बेन मिलापचंदजी , उर्मिला बेन भंवरलालजी एवं संगीता बेन शशिकान्तजी ने उदारता के साथ चढावा लेकर की। नूतन साध्वी का नाम साध्वीजी कृपांशी रेखाश्रीजी रखा गया। धर्मसभा में जैसे ही यह नाम उद्घोषित किया गया तो पुरे पांडाल में तालियों के साथ साध्वीजी की जय-जयकार करते हुऐ उनका वधामणा अक्षतो से किया गया।
मुमुक्षु कोमल कुमारी ने दीक्षा लेने के लिए सुबह 3.15 बजे अपने घर से प्रस्थान कर मंदिरजी में भगवान शांतिनाथ की अंतिम पूजा करके युगादि संयम वाटिका में प्रवेश किया। माता मंजुला बेन, पिता पुखराजजी परमार एवं परिवारजनो ने विजयीभव का आर्शीवाद देते हुऐ उसे संयम पथ पर विदा किया। गुरू भगवंतो का पूजन कर दीक्षा की मंगल क्रिया प्रारंभ हुई। भगवान के नाल के समक्ष तीन प्रदक्षिणा दी व रजोहरण ग्रहण करने के गुरु मुख से मय मुंडावेहं, मम पव्वावेह, मम बेसं समप्पेह ये तीन आदेश मांगे गये। उसके बाद कोमल बेन को शुभ मुहूर्त में रजोहरण यानि ओघा अर्पण किया तो मुमुक्षु नाच उठी एवं लोगों ने अक्षतों से बधाया। सुबह का जल्दी समय होने पर भी मंडप पुरा भक्तो से भरा हुआ था। इस पावन प्रसंग पर आचार्य श्री भाग्येशसूरीश्वरजी म.सा. व शीलरत्नसूरीश्वरजी म.सा. भी उपस्थित रहे। दीक्षा महोत्सव में ग्रामवासी, अनेक श्रेष्ठिवयो एवं श्रावक-श्राविकाएं भी बडी संख्या में उपस्थित थें। भटाना गांव में यह नौंवी दीक्षा थी। प्रवर्तिनी साध्वीजी पुण्यरेखाश्रीजी म.सा. के परिवार में शामिल होने वाली नूतन साध्वी कृपांशी रेखाश्रीजी 498 वीं शिष्या बनी।

दीक्षा यानि परमात्मा के प्रति समर्पण सम्मोहन: आचार्य भाग्येशसूरीजी

दीक्षा महोत्सव में आचार्य भगवंत भाग्येशसूरीश्वरजी महाराजा देलवाड़ा से विहार कर भटाना पहुंचे और धर्मसभा में अपने विचार रखते हुऐ बताया कि परमात्मा के प्रति सम्मोहन होना यानि संयम का मार्ग दीक्षा ग्रहण करना है। उन्होंने कहा कि कोमल में वैराग्य भाव अंतर मन में छीपा हुआ था इस कारण उसने आज की भोतिक चकाचैंध से दूर हटकर संयम का मार्ग अपनाया और परमात्मा के प्रति समर्पित हो गई। रजोहरण में कितनी शक्ति होती है वो उस वक्त साफ दिखाई देती है जब दीक्षा देने वाले आचार्य भगवंत रजोहरण यानि ओघा दीक्षार्थी को अर्पण करते हैं तो वो कितने भाव व खुशी से नाचने लगते हैं। आचार्यश्री ने बताया कि यह रजोहरण दीक्षार्थी के लिए परमात्मा का प्रसाद है और रजोहरण मिलते ही उसके रोम रोम में आनंद ही आनंद छा जाता है। रजोहरण मिलने के बाद दीक्षार्थी प्रभु एवं पंच महाव्रत के प्रति पूरी तरह समर्पित हो जाता है और उसके बाद वो बिना किसी राग द्वेष के जगत को निहारने का काम अपने गुरूदेव की आज्ञानुसार करते हैं।
साध्वी बनने के बाद काम में आने वाले उपकरणों के चढावे बोलकर उनके परिवारजनों ने ’’ उपकरण वोहराने ’’ का लाभ लेकर उपकरण अर्पण किये। नूतन साध्वीजी अब इन्ही उपकरणो का उपयोग संयम जीवन में करेगी। श्री जैन संघ भटाना के अध्यक्ष पुखराज भबुतमल जी एवं दीक्षा महोत्सव के आयोजन पुखराजजी चुन्नीलालजी परमार परिवार ने दीक्षा में पधारने वाले लोगों का स्वागत करते हुऐ कहा कि उनके आगमन से दीक्षा महोत्सव में चार चांद लगें ओर दीक्षार्थी का मनोबल में वृद्धि हुई उसके लिए वे ह्रदय से सभी के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।

संपादक भावेश आर्य

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