डिग्री आर्थिक बदलाव लाती है जब कि दीक्षा शांति दिलाता है: रूपातीतरेखा श्री

सिरोही(हरीश दवे)।

शिक्षा ग्रहण करने के बाद जो डिग्री मिलती है वो मात्र आर्थिक परिस्थितियों में बदलाव ला सकती हैं लेकिन संयम जीवन यानि दीक्षा लेने पर अभ्यतंर सुख ओर मन की शांति मिलती हैं। ये विचार जैन साध्वी रूपातीत रेखाश्रीजी ने हाईवर्ड युनिवर्सिटी से शिक्षा ग्रहण करने वाले एक प्रतिनिधि मंडल के समक्ष व्यक्त कियें। आर के ट्रस्ट बंगलुरू के चेयरमेन रमेश कुमार शाह ने हाईवर्ड युनिवर्सिटी से शिक्षित प्रतिभाओ को लेकर श्री पावापुरी तीर्थ-जीव मैत्रीधाम का अवलोकन करवा रहे थे तो इस दल के सदस्यों की नजर वहां विराजित युवा साध्वियों की तरफ गई तो उन्होनें उनसे मिलने व कुछ सवाल करने की इच्छा व्यक्त की। इस पर पावापुरी ट्रस्ट के मेनेजिंग ट्रस्टी महावीर जैन ने उनको साध्वियों से मिलाया। उन्होनें अपनी अनेक जिज्ञाशाओं को साध्वियों के सामने रखा तो साध्वियों ने उनका तार्किक रूप से जबाब देकर उन्हें सन्तुष्ठ किया जिससे वो हतप्रत हो गये ओर उन्हे पता चला कि जैन साधु-साध्वियों का जीवन कितना कठिन व अनुशासित होता हैं। जैन धर्म को जानने व समझने की उनकी प्यास को साध्वीजी ने समझा ओर उनके अनेक प्रश्नो का सरलता से सीधा जबाब दिया। आचार्य गुणरत्नसूरीजी के समुदाय की साध्वी रूपातीत रेखाश्रीजी की गुरूमैया साध्वी हेमलरेखाश्रीजी ने केवल 7 वर्ष की आयु में दीक्षा ली ओर आज उन्हें दीक्षा के 26 वर्ष हो गये हैं। इस समुदाय की प्रर्वतनी साध्वीश्री पुण्यरेखाश्रीजी के 490 शिष्या हैं।
साध्वीजी ने कहा कि प्रभु महावीर सहित 24 तीर्थकरों एवं अनंत सिद्ध भगवंत जिनके पास अथाह सम्पति, राजवैभव, मान-सम्मान होते हुऐ भी उन्होंने आत्मिक सुख ओर वैभव को पाने के लिए संयम मार्ग अपनाकर परिवार, राजवैभव इत्यादि का त्याग किया ओर आत्मा का कल्यार्ण कर सिद्ध गति की प्राप्ति की। साध्वीजी ने कहा कि शक्ति, त्याग ओर आत्म कल्याण की साधना प्रभु की कृपा से प्राप्त होती हैं ओर संयम जीवन की नीव देव ओर गुरू हैं।
उन्होनें सांसारिक जीवन एवं संयम जीवन में क्या अंतर हैं के सवाल का जबाब देते हुऐ कहा कि सांसारिक जीवन में कितना भी सुख हो परन्तु व्यक्ति को अधीनता का जीवन जीना ही पडता हैं लेकिन संयम मार्ग मंे प्रभु ओर गुरू के बनकर हम आत्म कल्याण कर सकते हैं।वैभवपूर्ण सांसारिक जीवन को त्याग कर दीक्षा लेने पर भूतकाल याद नही आता हैं के जबाब में साध्वीजी ने कहा कि ’’ आग में निकल कर मूर्ख इन्सान को ही आग में जाने की इच्छा होती हैं। ’’ संसार दावानल रूपी है जहां रोग, कषाय, पीडा, तिरस्कार जैसे अनेक दुःख के निमित्त से लोग जल रहे हैं। उन्होने कहा कि संयम जीवन उपवन समान हैं जहां भक्ति स्वाध्याय, विनय, वैयाव्च्च जैसे अनेक योग है, इसलिए यहां आनंद पाने के लिए भूतकाल की याद आना असम्भव हैं।
किसी को अपने कारण दुःख नही पहुचे साध्वीयो ने दल की सभी प्रतिभाओं को जैन धर्म के मूल तत्व, अंहिसा परमोधर्म एवं भगवान महावीर के संदेश ’’ जीओ ओर जीने दो ’’ की महिमा बताते हुऐ कहा कि आप जीवन में चाहे कोई धर्म अपनाते हो, परन्तु जब तक आप कोई जीव चाहे छोटा हो या बडा हो उसको मेरे कारण कोई दुःख नही पहुंचे के भाव रखने की प्रेरणा दी। दल ने साध्वीजी समपर्णलीनाश्रीजी से भी भेंट कर उनसे भी अनेक प्रश्नो का उत्तर प्राप्त किया।
प्रतिनिधिदल मिला बिट्टा से
प्रतिनिधि मंडल ने पावापुरी में आतंकवाद विरोधी मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष एम. एस. बिट्टा से भी भेंट कर उनके राष्ट्रीयता से ओतप्रोत विचारों को भी सुना। इस प्रतिनिधि मंडल में रमेश कुमार शाह के अलावा उज्जवला शाह, मेघना, प्रतिभा कामत, रेणु, सरोज, उमा आये एवं श्रीराम शामिल थें। दल के सदस्य देश के विभिन्न महानगरो में व्यवसायरत है। दल ने मंदिर में पाश्र्वनाथ भगवान के दर्शन किए, गौशाला में गौपूजन किया, आर्ट गेलेरी में चित्रो को देखने के बाद कहा कि के पी संघवी परिवार ने 21 वीं शताब्दी में एक ऐसी स्मृति खडी की हैं जिसको देखने के लिए लोगो में आज भी जिज्ञासा बनी हुई हैं।

संपादक भावेश आर्य



