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अकाल मृत्यु नाश करने का महापर्व शिवरात्रि 15 फरवरी को

शिवरात्रि के दिन देवाधिदेव महादेव ने समुद्र मंथन से निकला हलाहल जहर पिया और कहलाये मृत्युन्जय, नीलकंठ,आशुतोष


सिरोही(हरीश दवे) ।

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की नीशीथव्यापिनी चतुर्दशी को शिवरात्रि मनाने का विधान है, अतः महा शिवरात्रि पर्व फाल्गुन कृष्णा त्रयोदशी परं चतुर्दशी रविवार 15फरवरी मनाया जायेगा।
ज्योतिष एवं वास्तुविद् आचार्य प्रदीप दवे ने वृहद रुद्र संहिता के अनुसार बताया कि सृष्टि को बचाने के लिए देवाधिदेव महादेव ने फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को सायंकाल समुद्र मंथन से निकला हलाहल जहर पी लिया। जहर पीने के बाद भक्तों को यह डर सताने लगा कि इस हलाहल जहर के दुष्प्रभाव से भगवान को कुछ हो नहीं जाय, इसलिए भगवान को पूरी रात जगाए रखा और सोने नहीं दिया। तभी से रात्रि जागरण कर शिवरात्रि मनाने की परंपरा चल रही है।
भगवान को जगाये रखने के पीछे कारण यह था कि विषपान किये हुए या जहरीले सांप आदि के द्वारा काटे हुए व्यक्ति को जगाना आवश्यक होता है क्योंकि यदि भूलवश सोने दिया जाता है तो उस विष का दुष्प्रभाव दुगुना हो जाता है और यहाँ तक कि मृत्यु भी हो सकती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए शिवभक्तों ने पूरी रात ढोल-नगाडे बजाकर एवं जलाभिषेक करते हुए भगवान को जगाए रखा। जब चतुर्थ प्रहर समाप्त हुआ, तो भगवान को कुछ नहीं हुआ। इस प्रकार भगवान ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की और भगवान “मृत्युन्जय” कहलाये। भगवान को सकुशल देखकर भक्तों ने खुशी का इजहार किया, महाआरती की तथा मिठाईयां बांटी। तभी से अकाल मृत्यु, असाध्य रोगों का नाश तथा समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करने हेतु रात्रि जागरण कर शिवरात्रि मनाने की परंपरा है।


पूजन विधि-


सर्वप्रथम गणपति भगवान का स्मरण कर शिवलिंग पर 108 बार “ॐ नमः शिवाय” बोलते हुए गंगाजल से अभिषेक करें। तत्पश्चात शुद्ध वस्त्र से साफ कर अष्टगंध से त्रिपुण्ड करें व सौभाग्य द्रव्य चढावें। सुगंधित पुष्प व बिल्वपत्र से श्रृंगार करें, फिर आरती कर प्रसाद चढावें। शेष समय में मंदिर परिसर में एक स्थान पर बैठकर बीज मंत्र “ॐ नमः शिवाय” का जाप करें। यदि साधक महिला है तो “नमः शिवाय” का जाप करना चाहिए। बीज मंत्र जाप से समस्त प्रकार की व्याधियों का नाश होता है, अकाल मृत्यु नहीं होती है तथा समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती है।
निशीथ काल अर्थात् रात्रि का दूसरा व तीसरा प्रहर, जो रात्रि 09.00 बजे से प्रारंभ होकर रात्रि 3.00 बजे तक कुल 6 घंटे तक रहता है। इस समय बीज मंत्र का जाप करने से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती


पूजा एवं अभिषक में दूध का प्रयोग वर्जित-


भूख से व्याकुल स्तनपान करते हुए बछडे को जबरन हटाकर निकाला गया दूध पूजा में ग्राह्य नहीं है। अतः ऐसे दूध से अभिषेक नहीं करना चाहिए, शगुन भी नहीं लेना चाहिए तथा व्रत-उपवास में सेवन नहीं करना चाहिए।
यह ध्यान रहे कि स्तन-पान करते हुए बछड़े को पूर्ण तृप्त होने के पश्चात ही निकाला गया दूध ही पूजा में ग्राह्य है। इसलिए पहले बछड़े को पूर्ण तृप्त होने दें। तृप्त होने के बाद जब बछडा स्वतः स्तन छोड दें, फिर दूध निकालें। यही दूध पूजा में ग्राह्य है।


व्रत-उपवास का महत्व एवं नियम-


उपवास का अर्थ होता है भगवान के पास वास या निवास करना। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को चन्द्रमा सूर्य के समीप होता है। अतः यही समय जीवनरुपी चन्द्रमा का शिव रुपी सूर्य के साथ योग-मिलन होता है। अतः इस चतुर्दशी को शिवपूजा एवं उपवास करने से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।
उपवास के दिन बार-बार जल पीने, पान खाने, दिन में सोने, ब्रह्मचर्य व्रत का पालन नहीं करने, अश्रुपात रुदन करने, क्रोध करने, अधिक बोलने, पराए अन्न का भोजन करने तथा दूध व दूध से बनी मिठाई खाने से व्रत-उपवास का फल नष्ट हो जाता है।
लेकिन सभी प्रकार के ॠतु फल खाने, कंदमूल (आलू, शकरकंद, अरबी, रतालू) खाने, दवाई लेने व भगवान का प्रसाद खाने से व्रत-उपवास का फल नष्ट नहीं होता है।दवे ने बताया की
शहद का प्रयोग नहीं करना चाहिये
मधुमक्खी को छत्ते से भगा कर उसे बेघर कर निकाला गया शहद पूजा एवं उपवास में ग्राह्य नहीं है।
लेकिन जब मधुमक्खी स्वतः छत्ते को छोडकर चली जाय, फिर शहद निकाला जाय, वही शहद पूजा व उपवास में ग्राह्य है।

संपादक भावेश आर्य

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