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*आचार्यश्री लब्धिवल्लभसूरीजी महाराज साहेब के कर कमलों से*

*डिजिटल उपवास पुस्तक एवं पच्चक्काण का हुआ लोकार्पण*

 

 

*आध्यात्मिक साधना का डिजिटल युग में अभिनव प्रवेश*

सिरोही(हरीश दवे)।

सिरोही जिले के कालंद्री में उज्ज्वला फार्म रिट्रीट में आयोजित त्रिदिवसीय आध्यात्मिक शिविर का वातावरण आज उस समय और भी दिव्य एवं अलौंकिक बन गया, जब परम पूज्य आचार्यश्री लब्धिवल्लभसूरीजी महाराज साहेब के पावन करकमलों से डिजिटल उपवास पुस्तक एवं पच्चक्काण का भव्य लोकार्पण सम्पन्न हुआ।

इस पुस्तक के माध्यम से साधकों को प्रेरित किया गया है कि वे अपने जीवन में शांति और साधना के लिए कुछ समय के लिए डिजिटल साधनों का त्याग कर डिजिटल उपवास करने के लिए धारणा यानि संकल्प करें।
यह अभिनव प्रयास आर. के. ट्रस्ट बंगलुरू के संस्थापक श्रद्धेय रमेश कुमार शाह द्वारा अत्यंत समर्पण, श्रद्धा एवं दूरदृष्टि के साथ किया गया है। आधुनिक तकनीक के माध्यम से जैन धर्म की अमूल्य परंपराओं को जन-जन तक सहज रूप में पहुँचाने का उनका यह एक प्रेरणादायी प्रयास है। लोकार्पण के उपरांत इस डिजिटल उपवास पुस्तक एवं पच्चक्काण को शिविर में उपस्थित सभी साधक-श्रावक-श्राविकाओं को पूर्ण जानकारी देते हुऐ उन्हें गुरुप्रसाद स्वरूप भेंट किया गया। जैन धर्म में पचक्काण का बहुत बड़ा महत्व हैं, पचक्काण का मतलब कोई स्वाध्याय या तप या जाप शुरू करने के पहले उसके जो नियम ओर प्रक्रिया हे उसकी पालना दृढ़ता पूर्वक करने का स्वसंकल्प लेना यानि धारण करना हैं।

*तकनीक तभी सार्थक है, जब वह आत्मकल्याण, संयम*,
*स्वाध्याय और आत्मजागरण का माध्यम बने: आचार्यश्री*

अपने मंगलमय उद्बोधन में आचार्यश्री ने प्रेरणा प्रदान की कि वास्तविक आध्यात्मिकता केवल मंदिरों या प्रवचनों तक सीमित नहीं रहती हैं, बल्कि वह जीवन के प्रत्येक क्षण, प्रत्येक निर्णय और प्रत्येक व्यवहार को पवित्र बना देती हैं। जब साधना आधुनिक साधनों के साथ जुड़ती है, तब धर्म का प्रकाश अधिक व्यापक, अधिक सुलभ और अधिक प्रभावी रूप में समाज तक पहुँचता है। उन्होंने बताया कि तकनीक तभी सार्थक है, जब वह आत्मकल्याण, संयम, स्वाध्याय और आत्मजागरण का माध्यम बन जाए।
इस पुस्तक को तैयार करने की सोच रखने वाले रमेश कुमार पी. शाह ने बताया कि डिजिटल उपवास पुस्तक एवं पच्चक्काण इसी भावना का साकार रूप है। यह केवल एक डिजिटल साधन नहीं, बल्कि वर्तमान युग के साधकों के लिए संयम, आराधना और आत्मानुशासन का एक जीवंत सेतु है, जो प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं को आधुनिक जीवन की गति के साथ जोड़ता है।
त्रिदिवसीय वाचना शिविर में उपस्थित सभी साधकों ने इस ऐतिहासिक अवसर को अत्यंत श्रद्धा, हर्ष एवं कृतज्ञता के साथ अनुभव किया। उपस्थित जनसमुदाय के लिए यह केवल एक पुस्तक का लोकार्पण नहीं था, बल्कि आध्यात्मिक चेतना और आधुनिक तकनीक के दिव्य समन्वय का एक अविस्मरणीय उत्सव बन गया। इस डिजिटल युग में युवा एवं युवतियों को जैन धर्म से जोड़ने ओर धर्म को समझने के लिए यह डिजिटल उपवास पुस्तक मिल का पत्थर साबित होगी।

संपादक भावेश आर्य 

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