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मारवाड़ के कुलदीपक को संरक्षण देकर सिरोही के महाराव ने रचा था, राष्ट्र प्रथम का उच्च आदर्श एवं प्रेरणादायक इतिहास : डिंगार


सिरोही के महाराव ने की थी दुर्गादास राठौड़ की सहायता,


सिरोही(हरीश दवे)।

वीर शिरोमणि स्वामीभक्त दुर्गादास राठौड़ की 387 वी जयंती पर इतिहासकार डॉक्टर उदयसिंह डिंगार ने विशेष आलेख प्रस्तुत करते हुए बताया कि सिरोही नरेश महाराव वेरीसाल प्रथम ने विषम परिस्थितियों एवं संकट काल में दुर्गादास राठौर एवं जोधपुर मारवाड़ के राजकुमार अजीतसिंह को संरक्षण और सहायता प्रदान कर जो प्रातः स्मरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया, वह राष्ट्रधर्म एवं राष्ट्र प्रथम के उच्च आदर्शों का गौरवशाली एवं प्रेरणादायक इतिहास है। दुर्गादास राठौड़ का जन्म श्रावण शुक्ल चतुर्दशी (चवदस) विक्रम संवत 1695 (सन 1638 ई )को हुआ था। उनके जन्मोत्सव को लेकर यह उक्ति प्रसिद्ध रही है_
“संवत 1695 चवदस श्रावण मास ।
मरुधरा में भले जन्मियों बाबो दुर्गादास ।।”
इतिहासकार पंडित विश्वेश्वर रेऊ के अनुसार सन 1678 ईस्वी में मुगल सेनापति के रूप में काबूल विजय कर लौटते समय जमरूद के निकट खाईबर के दर्रे में महाराजा जसवंतसिंह जोधपुर की हत्या करवा दी गई थी, उनके दोनों राजकुमारों दलथंबन एवं अजीतसिंह को दिल्ली बुलवाकर कृष्णगढ़ के राजा रूपसिंह की हवेली में औरंगजेब द्वारा कैद करवा दिया गया था एवं मारवाड़ राज्य को खालसा घोषित कर दिया गया था । मुगल बादशाह औरंगजेब द्वारा राजकुमार अजीतसिंह की हत्या की आशंका के कारण स्वामीभक्त दुर्गादास राठौड़ एवं मुकुंददास खींची आदि विषम परिस्थितियों के बावजूद कूटनीतिपूर्वक नन्हे बालक अजीतसिंह को लेकर उसके ननिहाल सिरोही में महाराव वेरीसाल प्रथम के पास पहुंचे। मुगल सत्ता के आक्रमण की परवाह किए बगैर सिरोही के शासक महाराव वेरीसाल प्रथम ने अपने उमराव ठाकुर राजश्री कालंद्री के देखरेख में नन्हे राजकुमार अजीतसिंह को भगवान भुवनेश्वर के चरणों में नमन कर मारवाड़ राज्य के कुल दीपक को बचाने का देशधर्म राष्ट्र प्रथम का गौरवमय एवम् प्रातः स्मरणीय प्रेरणादायक इतिहास रचा । उन्होंने ठाकुर राजश्री कालंद्री की देखरेख में कालद्री में ब्राह्मण जयदेव की पत्नी के पास नन्हे राजकुमार को रखा गया। इसी क्रम में सिरोही रियासत के विभिन्न स्थलों पर दुर्गादास राठौड़ एवं मुकुंद दास खींची आदि के साथ नन्हे राजकुमार को कालंद्री, डोडुआ ,मामावली, पालड़ी समेत विविध स्थलों पर कई वर्षों तक सुरक्षित रखने में का अद्भुत एवं अनुकरणीय उदाहरण सिरोही नरेश द्वारा प्रस्तुत किया गया। सिरोही धरती में दुर्गादास राठौर के जीवन पर्यंत संघर्षरत स्वामीभक्ति का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करने को लेकर यह ऊक्ति प्रसिद्ध रही है _
“आठों पहर , चोसट घड़ी , घोड़े ऊपर सवार।
सेल अणि सू सेकता , बाटी दुर्गादास।”
सन 1707 ईस्वी में मुगल बादशाह औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात राजकुमार अजीत सिंह को मारवाड़ राज्य का स्वामी बनाने के करीब 10 वर्ष पश्चात 16 मई 1718 ई को अवंतीका (उज्जैन) में शिप्रा नदी के तट पर वीर दुर्गादास राठौड़ ने अंतिम सांस ली , जहां उनकी छतरी आज भी मौजूद है। दुर्गादास राठौड़ के संघर्ष , कूटनीति एवं रन कुशलता से मुगल सत्ता को चुनौती एवं भय को लेकर यह ऊक्ति प्रसिद्ध रही है _
दुर्गा आसकरण रा , नित सहला जाय।
अमल औरंग रो उतरे , दिल्ली धडूंका खाय।।”
वीर शिरोमणि स्वामीभक्त दुर्गादास राठौड़ की कर्मभूमि रही सिरोही क्षेत्र में आज भी उनके जीवन काल की ऐतिहासिक स्मृतियां उनके त्याग, तपस्या एवं स्वामीभक्ति को नमन करती हुई सी प्रतीत होती है।

संपादक भावेश आर्य

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